Kanke, Ranchi, Jharkhand

( A State Government University )

खरीफ अनुसंधान परिषद की दो दिवसीय बैठक संपन्न

मौसम परिवर्तन और कुपोषण की चुनौतियों से निबटने के लिए शोध प्रयासों को नई दिशा देगा बीएयू

रांची। राज्य के योजनाकारों, प्रशासकों, वैज्ञानिकों, कृषि उद्योगों और कृषि क्षेत्र में काम करनेवाले गैर सरकारी संगठनों के उपयोग के लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अपने द्वारा अबतक विकसित और अनुशंसित  उन्नत तकनीकों से संबंधित पुस्तक प्रकाशित करेगा।

‘कंपेंडियम ऑफ़ टेक्नोलॉजीज’ नाम से प्रकाश्य इस डॉक्यूमेंट में फसल प्रभेदों, कृषि यंत्रों, फसल प्रबंधन एवं पौधा संरक्षण तकनीकों, पशु-पक्षी नस्लों, पशु स्वास्थ्य प्रबंधन, मत्स्यपालन, एवं वन वर्धन तकनीकों से संबंधित जानकारी संग्रहीत रहेगी।

लगातार बदलते मौसम की चुनौतियों से निपटने के लिए जलवायु लचीली कृषि तकनीक विकसित करने तथा कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए चावल, मक्का, मड़ुआ आदि फसलों में प्रोटीन तथा जिंक, आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने हेतु बायोफोर्टीफाइड फसल प्रभेदों के विकास पर शोध प्रयास केंद्रित किया जाएगा।

कुलपति डॉ ओंकार नाथ सिंह की अध्यक्षता में आज संपन्न खरीफ अनुसंधान परिषद की दोदिवसीय बैठक में ये निर्णय लिये गये। कुलपति ने छात्र-छात्राओं के स्नातकोत्तर अनुसंधान कार्यों को आगे बढ़ाने की कार्य योजना बनाने के लिए डीन, स्नातकोत्तर शिक्षा संकाय की अध्यक्षता में एक समिति बनाने की घोषणा की।

कृषि क्षेत्र में उभरते संचार तकनीकों के प्रभावी प्रयोग के लिए भी शोध कार्यक्रम बनाया जाएगा।  राज्य के विभिन्न कृषि मौसम क्षेत्रों और जिलों में कृषि और पशु उत्पादकता में भारी अन्तर के कारणों को चिन्हित करने और उनके निराकरण के उपाय सुझाने के लिए एक पॉलिसी डॉक्यूमेंट विकसित किया जाएगा। औषधीय पौधों की गुणवत्तायुक्त रोपण सामग्री तैयार करने तथा उनके मूल्य संवर्धन एवं विपणन के दिशा में शोध प्रयास किया जाएगा।

नई जरूरतों तथा किसानों की शिकायतों, अपेक्षाओं, प्राथमिकताओं के अनुरूप सुस्पष्ट उद्देश्यों के साथ शोध कार्यक्रमों को दिशा दी जाएगी ।

गाय की देशी नस्लों की दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाने और उसके गुणों के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। विशेषज्ञों की राय थी कि विदेशी नस्लों की गाय के 5-10 किलो दूध के मुकाबले देशी गाय का एक किलो दूध भी ज्यादा गुणकारी हो सकता है। इसे शोध आधार प्रदान करने की आवश्यकता है।

प्रति वर्ष बड़ी संख्या में झारसूक (टी एण्ड डी) नस्ल के सूअर बच्चे तैयार करने और और सेकेंड लाइन ब्रीडर के रूप में सूअर प्रजनन केंद्र चला रहे पशुपालकों को उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया। बीएयू के मार्गदर्शन में अभी झारखंड, छत्तीसगढ़ असम के लगभग 350 पशुपालक सूअर प्रजनन का कार्य कर रहे हैं।

बैठक में बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर  के पूर्व कुलपति डॉ ए के सिंह, वाह्य विशेषज्ञ के रूप में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, समस्तीपुर के मृदा विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ एसबी पांडेय, बिएयू के पूर्व शोध निदेशक डॉ डीके सिंह द्रोण और वर्तमान अनुसंधान निदेशक डॉ ए वदूद ने अपने महत्वपूर्ण सुझाव रखे। उप अनुसंधान निदेशक डॉ सीएस महतो ने आभार ज्ञापन किया।

चान्हो (रांची) के प्रगतिशील किसान नंद किशोर साहू ने बीएयू के मार्गदर्शन में ड्रिप सिंचाई के माध्यम से तथा विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे केंचुआ खाद एवं जीवाणु खाद के प्रयोग से उत्पादकता में हुई विशिष्ट वृद्धि की चर्चा की।