बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में गेहूँ एवं जौ शोध वैज्ञानिकों के तीन दिवसीय सम्मलेन का समापन

सीमित सिंचाई और वर्षाश्रित परिस्थितियों के लिए गेहूँ के नए प्रभेद एच आई-1612 और के-1317 की अनुशंसा

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में आज संपन्न हुए गेहूँ एवं जौ शोध कार्यकर्ताओं के 57वें सम्मलेन में पूर्वी भारत और झारखण्ड में लगाने के लिए गेहूँ के नए उच्च उपजशील प्रभेद एच आई-1612 और के-1317 की अनुशंसा की गई क्योंकि ये प्रभेद सीमित सिचाई और वर्षाश्रित परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देते हैं I भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण में वर्ष 2017-18 में गेहूँ के कुल 14 उन्नत प्रभेद जारी किए गये जो प्रमुख रोगों एवं कीड़ों के प्रति सहिष्णु हैं और  विभिन्न राज्यों में इस फसल की पैकेज प्रणाली के साथ खेती के लिए अनुशंसित हैं I देश के शोध संस्थानों में प्रजनन कार्यक्रम में शामिल करने हेतु गर्मी के प्रति सहिष्णुता वाले प्रभेद एच डी 3219, पीबीडब्लू 752, एच आई 1617, डब्लू एच 1202 और डीबी डब्लू 187 की अनुशंसा की गई I

गेहूँ से तैयार किए जाने वाले विभिन्न उत्पाद के लिए निश्चित प्रभेदों को सुदृढ़ करने एवं उनका उपयोग करने की अनुशंसा की गई I चपाती के लिए डब्लू एच 1124, डीबीडब्लू 71, एच डी 3237 और पीबी डब्लू 757 लगाने की अनुशंसा की गई जबकि ब्रेड (पावरोटी) के लिए डब्लू एच 1124, एच डी 2967, एच डी 3059, डब्लू एच 1080, एच डी 2733, डीबीडब्लू 71, एच डी 3226 और पीबी डब्लू 752 प्रभेदों के उत्पादन पर जोर दिया गया I इसी प्रकार बिस्कुट के लिए एच एस 490 और डीबी डब्लू 168 प्रभेद को सर्वोत्तम बताते हुए इसकी खेती करने की अनुशंसा किसानों को दी गई I

जौ की बेहतर पैदावार लेने के लिए उत्तर पूर्वीं मैदानी क्षेत्र और केन्द्रीय क्षेत्र में डीडब्लू आरबी 137, केन्द्रीय क्षेत्र में आर डी 2899 तथा उत्तर पूर्वीं मैदानी क्षेत्र एवं उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के अम्लीयता एवं छारियता प्रभावित इलाकों में आरडी 2907 लगाने की अनुशंसा की गई I जौ के बीज उपचार के लिए एजोटो बैक्टर और पीएसबी का इस्तेमाल करने की वकालत की गई क्योंकि ऐसा करने से नाइट्रोजन का इस्तेमाल 25 प्रतिशत कम करना पड़ता है और उपज भी काफी अच्छी होती है I इसी प्रकार उत्पादन लागत में कमी लाते हुए उत्पादकता वृद्धि के लिए फसल संरक्षण और संसाधन प्रबंधन संबंधी तकनीकी अनुशंसा भी की गई I

भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल से आये प्रधान वैज्ञानिक डॉ रवीश चतरथ, डॉ आरके शर्मा, डॉ डीपी सिंह, डॉ सेवा राम, डॉ ए एस खरब और डॉ जीपी सिंह ने आज समापन सत्र में अनुशंसाओं की प्रस्तुति की I सत्र की अध्यक्षता बीएयू के अनुसंधान निदेशक डॉ डी एन सिंह ने की I

अंतर्राष्ट्रीय लिंकेज पर तकनीकी सत्र

इसके पूर्व सुबह में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान , नई दिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ एच एस गुप्ता की अध्यक्षता में अंतर्राष्ट्रीय लिंकेज पर एक तकनिकी सत्र का आयोजन किया गया I सत्र के सह अध्यक्ष बीएयू के अनुवांशिकी एवं पौधा प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डॉ जेड ए हैदर थे I

इस सत्र में अपने विचार रखते हुए कोर्नेल विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क के अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के निदेशक डॉ रोनी कोफमैन ने कहा कि लगातार बढ़ रहे वैश्विक तापक्रम के कारण गेहूँ उत्पादकता पर संकट संभावित है इसलिए  कोर्नेल विश्वविद्यालय के बोरलाग ग्लोबल रस्ट इनिशिएटिव ने गेहूँ के 140 से अधिक उन्नत प्रभेद विकसित किया है I इसके अतिरिक्त कीड़ों एवं रोगों का सर्वेक्षण एवं अनुश्रवण, नर्सरी की स्क्रीनिंग, बीज गुणन एवं वितरण तथा संचार का भी काम किया जा रहा है I बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन तथा यूके एड के सहयोग से 700 वैज्ञानिकों को गेहूँ उत्पादकता वृद्धि संबंधी चुनौतियों एवं अवसरों के बारे में प्रशिक्षण दिया गया जिनमें महिलाओं की काफी संख्या है I

अंतर्राष्ट्रीय मक्का एवं गेहूँ विकास केंद्र (सिमिट) के गेहूँ रोग विशेषज्ञ डॉ पवन कुमार सिंह ने दक्षिण पूर्व एशिया में गेहूँ के ब्लास्ट रोग से हो रहे नुकसान की चर्चा की और कहा कि आधिकारिक रूप से भारत में इस रोग का प्रकोप नहीं है I चूँकि पड़ोसी देश बांग्लादेश में इस रोग का काफी फैलाव है इसलिए भारत को इसके प्रति सचेत रहने की जरुरत है क्योंकि इसका प्रकोप होने से उपज में 10 से 15 प्रतिशत का नुकसान हो जाता है I सिमिट द्वारा विकसित गेहूँ का मिलान प्रभेद मैदानी परिस्थितियों में ब्लास्ट के प्रति प्रतिरोधी है I

सिमिट के गेहूँ प्रजनक डॉ रवि प्रकाश सिंह ने उपज वृद्धि हेतु गेहूँ प्रजनन कार्यक्रम की वर्त्तमान स्थिति और भविष्य की संभावना, डॉ. गोविंदन वेलु ने जैविक दृष्टि से सुदृढ़ गेहूँ संबंधी शोध, नेपाल के राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद, काठमांडू के कार्यकारी निदेशक डॉ बैद्यनाथ महतो ने नेपाल में गेहूँ सुधार कार्यक्रम की चुनौतियाँ एवं संभावनाएं तथा भूटान सरकार के कृषि एवं वन मंत्रालय के पदाधिकारी डॉ लेगजय ने भूटान में गेहूँ विकास कार्यक्रम विषय पर अपने विचार रखे I